किसी उद्देश्य से किया काम क्वालिटी बढ़ाता है: एन. रघुरामन मैनेजमेंट गुरु

उपयोगी बनना एक उद्देश्य है। एक बार जब उद्देश्य को नाम मिल जाता है तो काम की क्वालिटी भी बढ़ जाती है। 

मुझे लगता है कि इस बात पर कोई बहस नहीं हो सकती कि एक मां जब अपने बच्चों और पति के लिए खाना बनाती है तो उसका उद्देश्य होता है कि उसका परिवार खाने के हर दाने का आनंद ले। यही वजह है कि बहुत बार जब आप खाना खा रहे होते हैं तो उसकी नज़र आपके चेहरे के भाव पढ़ती रहती है। कई बार वह भी एक बच्चे की तरह आपकी तारीफ का इंतजार करती है। लेकिन, अधिकांश भारतीय तारीफ करने में कंजूस होते हैं। आपके चेहरे के भाव पढ़ने के बाद ही वह आगे और लेने का आग्रह करती है। अचानक आप देखते हैं कि उसके चेहरे की पूरी थकान गायब हो गई, क्योंकि उसने उद्देश्य हासिल कर लिया है। मेरे पिता की सोच थी कि कड़ी मेहनत कर पैसा कमाकर लाना उनका काम है, जबकि स्वादिष्ट भोजन बनाना और उसे परोसना मेरी मां का काम है। डिनर के समय, जब हम सभी जमीन पर बैठे होते थे, क्योंकि उस वक्त मेरे घर में डाइनिंग टेबल जैसा कुछ नहीं था तो यह नियम होता था कि बड़ों को छोड़कर और कोई कुछ नहीं बोलेगा। पर कभी-कभी देखने में आता था कि मां का चेहरा तारीफ के लिए लंबा इंतजार कर रहा है और उस दिन मेरे पिता एक नपी-तुली तारीफ करते थे, जैसे कि अगर उन्होंने ज्यादा तारीफ कर दी तो मां खाना बनाना बंद कर देगी। ठीक उस समय मैं अपनी मां के चेहरे पर एक चमक देखता था। ऐसी ही घटनाओं ने चुपके से मेरे अंदर मैनेजमेंट के सबक भर दिए।

ऐसा ही एक सबक मुझे मंगलवार सुबह उस समय याद आया, जब मेरे फोन में एक वॉट्सएप मैसेज मिला- मैसेज में एक कूरिअर बिल का फोटो था, जिस पर मेरा नाम था, राशि लिखी थी और भेजने की तारीख भी थी। इसके साथ ही कूरिअर कंपनी का जीएसटी नंबर और भेजने वाले व्यक्ति का नाम। इस छोटी-सी रसीद में एक बड़ा ही मजेदार फुटनोट लिखा था- ‘कूरिअर कम्पनी को पता नहीं है (यानी वह ज़िम्मेदार नहीं है) कि पार्सल में क्या है।’ स्पष्ट रूप से इस पर कूरिअर कंपनी का नाम था, पता और एसटीडी कोड के बिना एक छह अंकों वाला लैंडलाइन टेलीफोन नंबर भी लिखा था! हमारे यहां की पुरानी डाक प्रणाली समेत, किसी भी कूरिअर कंपनी की रसीद पर ध्यान दें तो पता चलता है कि पार्सल को कैसे ट्रैक किया जा सकता है। लेकिन, यह मुझे मिली रसीद में नहीं था। भेजने वाले का एक ही उद्देश्य था- ‘मेरा काम खत्म हुआ, मैंने वही किया जो आपने चाहा था और यह रहा उसका सबूत।’ यदि पार्सल मुझ तक नहीं पहुंचता है तो मैं भेजने वाले को जिम्मेदार नहीं ठहरा सकता। कंपनी ने उस फुटनोट के जरिये अपना उद्देश्य साफ कर दिया कि वह पार्सल के अंदर की सामग्री के लिए जिम्मेदार नहीं है, उसे तो सिर्फ कवर मिला है, इसलिए उसने रसीद जारी कर दी।


इस मामले में पाने वाला यानी मैं इस पूरी एक्सरसाइज़ का उद्देश्य समझ ही नहीं पाया, क्योंकि मैं तो बस इंतजार ही कर सकता हूं, पर उस पार्सल को भी ट्रैक नहीं कर सकता, क्योंकि ऐसा करने की सुविधा ही नहीं दी गई। भारत में 1,54,797 पोस्ट ऑफिस पर 19,100 पिनकोड हैं, जो देशभर में सभी स्थानों पर सीधे जुड़े हैं। कुछ बड़े नामों को छोड़ दें तो, ज्यादातर कूरिअर कंपनियां, एक छोटे से टपरेनुमा जगह से संचालित होती हैं (ऐसी ही एक कम्पनी की रसीद मुझे मिली)। ये सभी बिचौलिए की तरह काम करती हैं यानी सही व्यक्ति तक पहुंचने से पहले पार्सल
किसी दूसरे और तीसरे बिचौलिए के हाथों से होकर गुजरता है और उनमें से कोई भी पार्सल के अंदर की सामग्री के लिए जिम्मेदारी नहीं दिखाता, जो वास्तव में उद्देश्य होना चाहिए। 

फंडा यह है कि उपयोगी बनना एक उद्देश्य है। एक बार जब उद्देश्य को नाम मिल जाता है तो काम की क्वालिटी भी बढ़ जाती है। 
एन. रघुरामन मैनेजमेंट गुरु


 

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