कला को बेहतर बनाने के काम आए संघर्ष के दिन : कीर्ति कुल्हारी

कई हिट फिल्मों में काम कर चुकी अभिनेत्री ने अपने कॅरिअर की शुरुआत एक एड फिल्म से की थी

First Person। मूल रूप से राजस्थान की होने के बावजूद मेरी परवरिश मुम्बई में हुई, क्योंकि मेरे पिता नेवी में थे। मैं एक बहुत ही सख्त नियमों वाले घर में रही। मुझे यहां तक पहुंचने के लिए हर कदम पर अपने माता-पिता से इजाजत लेनी पड़ी, लेकिन यह अच्छा भी रहा, क्योंकि मैं जो कुछ भी कर रही थी, उसमें वे मेरे साथ रहे। हम दूरदर्शन देखते हुए बड़े हुए। मुझे याद नहीं कि कभी हमने कोई नई फिल्म देखी हो। हमारे घर में रात को 10 बजे लाइट्स ऑफ कर दी जाती थी। ऐसे माहौल में एक्ट्रेस बनने के बारे में सोचना बहुत दूर की बात थी। मेरे लिए अपने पेरेंट्स को इस बारे में बताना मुश्किल रहा। हालांकि मेरा परिवार मेरे इस आइडिया से कभी संतुष्ट नहीं हुआ, लेकिन एक बार जब मैंने पापा को बताया तो उन्होंने मेरा साथ दिया। फिल्म इंडस्ट्री में किसी को नहीं जानते हुए भी इस लाइन में आना काफी मुश्किल निर्णय था। इसके लिए मैंने अपने परिवार से दो साल का समय लिया जिससे मैं इस क्षेत्र में अपनी जगह बनाने के लिए पूरी तरह से मेहनत कर सकूं।

आसान नहीं था रास्ता, मगर पहचान बनी
इंडस्ट्री में आने के लिए मुझे काफी संघर्ष करना पड़ा। इसी बीच दो साल पूरे होने जा रहे थे। लेकिन अंतत: मुझे अपना पहला शूट मिला जो कि एक एड था। मेरे पेरेंट्स को मेरी इस सफलता की खबर तब हुई जब किसी ने उनको बधाई दी। वर्ष 2010 में मैंने अपनी पहली फिल्म खिचड़ी की, लेकिन मुझे यह समझने में समय लगा कि संघर्ष और मुश्किलें कभी खत्म नहीं होंगी। पिंक, ब्लैकमेल, इंदू सरकार और हालिया उरी जैसी फिल्मों तक का सफर आसान तो नहीं रहा, लेकिन अब मेरी एक पहचान जरूर बनी है।

मौकों का फायदा उठाने के लिए तैयारी है जरूरी 
कई बार मुझे लगा कि मुझे सब कुछ छोड़ देना चाहिए, क्योंकि चीजें हमेशा उस तरह से नहीं होती जैसे आप चाहते हैं। फिर भी काम का ख्याल मेरे मन में इतनी मजबूती से बना रहा कि हार मानने का विकल्प ही नहीं रहा। संघर्ष के दिनों में मैंने अपनी एक्टिंग को बेहतर बनाने पर काम किया। काम नहीं था तो मैं एक्टिंग की वर्कशॉप्स या थिएटर करती थी। मैं समझती हूं कि हम सब की यात्राएं अलग हैं। हमें बस अपने काम और हुनर पर ध्यान देना चाहिए। आज मैं बेहतर परफॉर्म करने में अपना ध्यान लगा रही हूं।  

मेरे नजरिए से काम लक्ष्य नहीं, यात्रा है
काम करते हुए एक बात मैं हमेशा महसूस करती हूं कि पसंद के काम में हम हमेशा पहले से अधिक और अन्य किसी काम से ज्यादा मेहनत करने को तैयार रहते हैं। फिल्म पिंक में कोर्ट के एक बहुत अहम सीन के बाद मैंने देखा कि पूरी टीम पर उस सीन का असर बहुत देर तक रहा। इस तरह के उदाहरण और भी बहुत हैं। दरअसल अपने हुनर से लोगों को इस तरह प्रभावित कर पाना ही सफलता है और मैं उसी के लिए हर बार पहले से अधिक मेहनत करती हूं। मुझे लगता हैकि मेरे जीवन का यही उद्देश्य है।
 

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