जिन्हें अंग्रेजों ने खुद के लिए किया शुरू, वो अब हमारी ताकत

आजादी के हमारे संघर्ष की दासतां और शहीदों की सूची, अंग्रेजों के 200 साल के क्रूर शासन की गवाह है।

एजुकेशन डेस्क। आजादी के हमारे संघर्ष की दासतां और शहीदों की सूची, अंग्रेजों के 200 साल के क्रूर शासन की गवाह है। मगर सच्चाई यह भी है कि इस क्रूरता के बीच खुद के हितों के लिए अंग्रेजों ने देश में जो व्यवस्थाएं शुरू कीं, उनमें से कुछ को अब हमने अपनी ताकत बना लिया है। 

दुनिया का चौथा सबसे बड़ा नेटवर्क भारत
- अंग्रेजों ने भारत में रेल सेवा की शुरुआत भले ही अपने हित के लिए की थी, लेकिन अब यह हमारी लाइफ लाइन है। इतना ही नहीं, इसे और बढ़ाकर अब हमने दुनिया का चौथा सबसे बड़ा रेल नेटवर्क तैयार कर लिया है। वैसे देश में रेल सेवा की शुरुआत का श्रेय गवर्नर जनरल डलहौजी को जाता है। उन्होंने 1843 में ही भारत में रेल चलाने की संभावनाएं तलाशनी शुरू कर दी थीं। इसलिए कि उस दौरान अंग्रेजों को युद्ध के मौकों पर सेना को एक से दूसरे स्थान पर भेजने के लिए आवागमन के बेहतर साधन की जरूरत महसूस होने लगी थी। दूसरा बड़ा कारण कपास की ढुलाई था, ताकि इसे ब्रिटेन की मिलों तक पहुंचाया जा सके। डलहौजी ने पहले मुंबई, कोलकाता, चेन्नई को रेलवे ट्रैक से जोड़ने का प्रस्ताव दिया। हालांकि इस पर अमल नहीं हो सका। इसके बाद 1849 में इस उद्देश्य के लिए ‘ग्रेट इंडियन पेनिनसुलर कंपनी’ कानून पारित किया गया और दो साल बाद 22 दिसंबर 1851 को पहली ट्रेन चलने भी लगी। मगर इसका इस्तेमाल रूड़की में निर्माण कार्य के लिए माल की ढुलाई में होने लगा। इसके बाद पहली व्यावसायिक ट्रेन 16 अप्रैल 1853 को महाराष्ट्र स्थित मुंबई और ठाणे के बीच लगभग 33.6 किमी लंबे ट्रैक पर चलाई गई। इस तरह 1947 तक अंग्रेज 53600 किलोमीटर का ट्रैक डाल चुके थे। उस समय सालाना 60 करोड़ लोग इससे यात्रा करते थे और 9 करोड़ टन माल की ढुलाई होती थी। अब आजादी के 69 साल बाद हम ट्रैक की कुल लंबाई को 11000 किलोमीटर बढ़ाकर 64600 किलोमीटर तक पहुंचा चुके हैं। इसकी मदद से वर्तमान में करीब 2.5 करोड़ लोग रोजाना यात्रा कर रहे हैं। यह संख्या ऑस्ट्रेलिया की कुल जनसंख्या के लगभग बराबर है। यह नेटवर्क इसलिए भी अहम है कि इससे लगभग 16 लाख लोगों का रोजगार जुड़ा हुआ है।

पोस्टल नेटवर्क 
विश्व में और कहीं नहीं जुड़े 1.55 लाख डाकघर
1863 में देश में रेल डाक सेवा व 1877 में पार्सल सेवा शुरू हो गई थी।

- राजतंत्र के दौरान से ही भारत में डाक प्रणाली संचार का अहम जरिया थी। हालांकि इसे एकीकृत अंग्रेजों ने किया। असल में 1766 में ईस्ट इंडिया कंपनी ने भी देश में डाक सेवा शुरू कर दी थी। वैसे तब सेवा अंग्रेजों के सामरिक और व्यापारिक हितों पर केंद्रित थी। मगर 1773 में गवर्नर
जनरल वॉरेन हेस्टिंग्स ने महा डाकपाल के अधीन कोलकाता में प्रधान डाकघर स्थापित किया और आम लोगों को भी इस सेवा का फायदा लेने की छूट दे दी। इसके बाद चेन्नई और मुंबई में डाक व्यवस्था शुरू की गईं। हालांकि इन्हें एकीकृत करने में अंग्रेजों को भी 43 साल लग गए। तीनों प्रेसीडेन्सी के सभी डाक संगठनों को मिलाकर देशस्तर पर एक व्यवस्था बनाने के लिए 1837 में डाक अधिनियम लागू किया गया। 1908 में भारत के 652 तत्कालीन राज्यों में से 635 इस व्यवस्था का हिस्सा बन गए। इसी का नजीता है कि आज भारत में 155015 डाकघरों का विशाल नेटवर्क है, जो विश्वभर में सबसे बड़ा है।

सिविल सर्विसे
व्यापारिक गतिविधियों के लिए चुनेजाते थे, अब संभाल रहे सबसे बड़ा लोकतंत

- ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन के दौरान 1764 में ही लोकसेवा की शुरुआत संरक्षित पदों के रूप में हो गई थी। तब कंपनी की व्यापारिक गतिविधियों के लिए नियुक्त अधिकारियों को लोक सेवकों की संज्ञा दे दी गई। इसके बाद नागरिक सेवा की शुरुआत कार्नवॉलिस द्वारा की गई, जो 1776 में भारत के गवर्नर जनरल बनकर भारत आए थे। कॉर्नवॉलिस ने कर्मचारियों का वेतन बढ़ाया तथा पदोन्नति वरिष्ठता के आधार पर निर्धारित की गई। इसके बाद 1800 में लोकसेवा अधिकारियों के शिक्षा व नैतिक मूल्यों में सुधार के उद्देश्य से फोर्ट विलियम कॉलेज की स्थापना की गई, जहां इन अधिकारियों को तीन वर्ष के प्रशिक्षण के तहत भारतीय भाषाओं, कानून व प्रशासन की जानकारी दी जाती थी। 1833 के चार्टर एक्ट द्वारा तो अधिकारियों की नियुक्ति के लिए प्रतियोगिता की व्यवस्था भी लागू कर दी गई, लेकिन यह प्रतियोगिता नामजद व्यक्तियों के बीच ही सीमित रही।

आखिर 1853 के एक्ट द्वारा भारतीय लोक सेवा को प्रतियोगी परीक्षाओं के माध्यम से सभी के लिए खोल दिया गया। इसी व्यवस्था में निरंतर विकास और बदलावों के बाद 1926 में पहले लोक सेवा आयोग का गठन हुआ। इसके सात साल बाद भारत शासन अधिनियम द्वारा भारत में संघ लोक सेवा आयोग का गठन किया गया। अब इस आयोग द्वारा चुने गए 5196 अधिकारी दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की प्रशासनिक व्यवस्था संभाल रहे हैं।

इन व्यवस्थाओं की नींव भी उसी समय की

- भारत में संसदीय प्रणाली, न्यायालयों की व्यवस्था, एक-व्यक्ति को एक मत का अधिकार आदि भी ब्रिटिश शासन की देन है। इतना ही नहीं ज्यादातर कानून, कानूनी भाषा व न्यायालय से जु़ड़े नियम-कायदे भी वैसे ही हैं, जो 1947 के पहले देश में प्रचलित थे। इनके अलावा भारत में जिला
प्रशासन, विश्वविद्यालय और स्टॉक एक्सचेंज जैसी संस्थागत व्यवस्था भी अंग्रेजों की बनाई हुई हैं। साथ में 1860–1880 के दशकों में ब्रिटिश राज ने जन्म-मृत्यु प्रमाण पत्र, विवाह सहित दत्तक, सम्पति दस्तावेज और अन्य कार्यों से सम्बद्ध प्रमाण पत्र अनिवार्यकिए थे।

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