शिक्षक दिवस/ फुटपाथ से लेकर इंटरनेट तक पहुंच बनाने वाले पांच शिक्षक

शिक्षक दिवस पर ऐसे पांच गुरुओं की कहानियां जिनके पढ़ाए बच्चे अब उन्हीं की मुहिम को आगे बढ़ा रहे हैं

आयुष जरीवाला. (एजुकेशन डेस्क). गुरु बच्चों को शिक्षित करने के साथ एक अच्छा इंसान भी बनाते हैं लेकिन जब बच्चे भी उनके सपनों को आगे बढ़ाएं तो यह गुरु दक्षिण से कम नहीं। आज शिक्षक दिवस है। दैनिक भास्कर ने ऐसे शिक्षकों से बात की जिन्होंने फुटपाथ से लेकर इंटरनेट तक शिक्षा का उजियारा फैलाया। वेस्ट मैटेरियल से साइंस के फंडे समझाए, इनोवेशन का रास्ता दिखाया। उनकी मुहिम को आगे बढ़ाने में उनके स्टूडेंट्स मदद भी कर रहे हैं। पढ़िए उनकी कहानी...

अरविंद गुप्ता, पुणे : कचरे से साइंस समझाकर अविष्कार के लिए प्रेरित करने वाले प्रोफेसर

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    साइंस को अनोखे तरीके समझाने का आइडिया कैसे आया?
    अरविंद : 
    1978 में मैंने एक साल टाटा मोटर्स से छुट्टी लेकर होशंगाबाद में आयोजित विज्ञान कार्यक्रम के लिए डॉ. अनिल सद्गोपाल के साथ काम किया था। इसमें बच्चों को सस्ती, स्थानीय चीजों से विज्ञान सिखाने पर जोर था जिससे गरीब बच्चे भी खुशी-खुशी सीख सकें। अगली कड़ी थी फेंकी हुई चीजों को इस्तेमाल करके विज्ञान प्रयोग और खिलोने बनाने की। उदाहरण के लिए पुरानी फेंकी हुई प्लास्टिक की बोतलों से हम 100 से अधिक चीजें बनाते हैं, पुराने अखबारों से 20 प्रकार की टोपियां बनाते हैं, जिन्हें बच्चे बनाकर पहन सकते हैं। इससे बच्चों में अविष्कार करने की आदत विकसित होगी।


    कितने सालों से ऐसा कर रहे हैं और लक्ष्य क्या है?
    अरविंद :
     पिछले 40 सालों से मैं इस काम में जुड़ा हूं,  हमारा लक्ष्य विज्ञान को प्रयोगों और खिलौनों के जरिए बच्चों के लिए रोचक और आसान बनाना है।   


    मिशन में कितना सफल हुए?
    अरविंद : 
    बदलाव आया है। अब स्कूलों में विज्ञान आसान तरीके और प्रोजेक्ट के जरिए सिखाया जाता है। यह कुछ स्कूलों तक ही सीमित है जिसे आगे ले जाने की कोशिश की जा रही है। कुछ साल पहले प्रधानमंत्री मोदी ने ‘मेक इन इंडिया’ का नारा दिया था। पर जल्द ही यह समझ आया कि जबतक बच्चे स्कूल में अपने हाथों से मॉडल नहीं बनाएंगे तब तक देश के उत्पादन में कभी क्रांति नहीं आएगी। सरकार ने कुछ वर्ष पहले ‘अटल टिंकरिंग लैब्स’ शुरू की हैं जिससे बच्चों की सृजनात्मकता को पंख मिले हैं। यू-ट्यूब पर हमारे छोटे-छोटे वीडियो को दुनिया भर में नौ करोड़ बच्चों ने देखा है। 


    निजी जिंदगी और टीचिंग के बीच कैसे तालमेल बिठाते हैं?
    अरविंद : मेरी पत्नी एक कॉलेज में पढ़ाती थीं और वो हम दोनों के लिए आर्थिक मदद करती थी। शायद यह भी एक कारण था कि मैंने जो कुछ किया उसे कर पाया। मैंने एक सबक सीखा है - जो तुम्हें सही लगे वो करो, पैसा और शोहरत की तरफ मत भागो।


    कहीं से आर्थिक मदद मिलती है?
    अरविंद : 
    मुझे 3000 से ज्यादा स्कूलों में वर्कशॉप, डेमोंस्ट्रेशन देने का मौका मिला है। यहां से होने आमदनी से जीविका चलती है। 11 वर्ष मैंने आयुका पुणे में साइंस सेंर में काम किया। आयुका ने रहने के लिए जगह उपलब्ध कराई और टाटा ट्रस्ट की ओर से हमारे प्रोजेक्ट को आर्थिक सहायता मिली।

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  • रोशनी मुखर्जी, धंबाद : कठिन विषयों का डर दूर करने के लिए चलाया एग्जाम फियर अभियान, लक्ष्य; हर बच्चा हो शिक्षित

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    ExamFear बनाने का आइडिया कैसे आया ?
    रोशनी : टीचिंग का जुनून पहले से ही था। कॉलेज पूरा करने के बाद आईटी सेक्टर में जॉब की। उस दौरान सोचा कि पूरी दुनिया में लाखों स्टूडेंट्स को पढ़ाने के लिए इंटरनेट का उपयोग किया जाए। घर पर काम करने वाली मेड ने मुझे बताया, उसके बच्चे एक छोटे से स्कूल में पढ़ रहे थे, पढ़ाई अच्छी न होने के कारण वे परीक्षा पास नहीं कर सके। इस घटना ने मेरी सोची बदली और लगा कि ऐसे कई लोग होंगे जिनके लिए अच्छी शिक्षा पाना आसान बात नहीं है। जुलाई 2011 में ExamFear नाम से कैंपेन शुरू किया। यूट्यूब पर वीडियो शेयर किए। कठिन से कठिन विषयों को आसान भाषा में समझाना शुरू किया। लोगों का अच्छा रिस्पांस मिला तो  वेबसाइट www.examfear.com लॉन्च की और मुफ्त शिक्षा देने का निर्णय लिया। 

    मुझे कई ईमेल मिले, जिनसे पता चला कि छोटे शहरों और गांवों के गरीब बच्चों को कैसे लाभ मिल रहा है। 2014 में नौकरी से इस्तीफा दे देकर पूरा फोकस ExamFear.com पर किया।

     

    आपका लक्ष्य क्या है?

    रोशनी : देश के हर बच्चे को शिक्षित करना ही मेरा लक्ष्य है। शिक्षा समाज में जागरुकता लाती है इसलिए किसी को इससे वंचित नहीं रहना चाहिए।


    अपनी पर्सनल लाइफ और कोचिंग को कैसे मेनेज करती हैं? 

    रोशनी : मैं अपने काम और निजी जीवन के साथ तालमेल बिठाकर काम करती हूं। मैं रोजाना एक रूटीन को फॉलो करने की कोशिश करती हूं। हालांकि यह कई बार हेक्टिक हो जाता है लेकिन अनुशासन, टाइम मैनेजमेंट और डेडिकेशन समय का सद्उपयोग करने में मदद करता है।


    किसी तरह की फंडिंग, या आर्थिक मदद मिलती है?

    रोशनी : आर्थिक मदद नहीं मिलती हैं, हां, वीडियाे पर मिलने वाले ऑनलाइन विज्ञापन कमाई का जरिया है। वेबसाइट पर आर्थिक मदद करने का विकल्प दिया गया है, जहां लोग अपनी मर्जी से कुछ भी योगदान देने के लिए स्वतंत्र हैं।

     

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  • आदित्य कुमार, लखनऊ : घर छोड़कर गरीब बच्चों को शिक्षित करने वाले ‘साइकिल गुरु’

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    कैसे आया आइडिया ?

    आदित्य : मैं गरीब परिवार से था। पिता मजदूरी करते थे। 1995 में बीएससी के बाद बिजनेस करने की सोची। लेकिन दिमाग में ख्याल आया कि जो गरीबी मैंने देखी है दूसरे बच्चे न देखें। इसलिए उन्हें शिक्षित करने का फैसला लिया। 

    घर वाले इससे नाखुश थे, लिहाजा, घर छोड़कर लखनऊ आ गया। रेलवे स्टेशन पर सोता था। शुरुआत स्टेशन पर भीख मांगने वाले बच्चों को पढ़ाकर की। 2 साल पढ़ाया, इस दौरान कुछ दोस्त बन गए जिन्होंने मुझे साइकिल दिलाई। आर्थिक मदद के लिए मैंने इंग्लिश ट्यूशन पढ़ाता था। गरीब बच्चों को पढ़ाते-पढ़ाते एक मुहिम सी चल गई और मैंने साइकिल से घूम घूम कर इसे आगे बढ़ाने का निश्चय किया। 


    कितने साल हो गए आपको 'साइकिल गुरु जी' बने हुए? और आपका क्या लक्ष्य है?

    आदित्य : साइकिल से बच्चों को पढ़ाते हुए 27 साल हो गए, जब तक जिंदा हूं पढ़ाता रहूंगा। 12 जनवरी 2015 को मैं लखनऊ से निकला था भारत भ्रमण के लिए। इस दौरान 20,000 जगहों बच्चों को शिक्षित किया। मैं बच्चों को इकट्ठा करके उन्हें बुनियादी शिक्षा के लिए तैयार करता हूं। कम से कम 1 से डेढ़ साल तक एक जगह क्लास चलाता हूं। बच्चों को स्कूल जाने के लिए प्रेरित करता हूं। कई बार लोग जुड़ते हैं और आर्थिक मदद भी करते हैं। 


    अपने अभियान और निजी जिंदगी में कैसे तालमेल बिठाते हैं?

    आदित्य :घर छोड़ने के बाद 12-13 साल तक गया ही नहीं। जब गया तो सभी खुश हुए। अब बच्चों को शिक्षित करना भी मेरी जिंदगी बन गई है। न मैंने शादी की और न मेरे पास कोई घर हैं। जहां भी पढ़ाने जाता हूं वहां अच्छे लोग भी मिलते हैं, जो रात गुजारने के साथ भोजन की व्यवस्था भी करते हैं। 


    आपको किसी तरह की आर्थिक मदद मिलती है?

    आदित्य : मुझे कई जगह पढ़ाने के लिए भी बुलाया जाता है। सम्मान में कभी कोई 5 हजार रुपए कोई 3 हजार रुपए दे देता है। कुछ समय पहले मैं मुम्बई गया ताे वहां अमिताभ बच्चन ने 10,000 रुपए दिए, जैकी श्रॉफ ने 5000 रुपए दिए। सिंगर अनूप जलोटा ने 5000 रुपए के साथ बच्चों के लिए किताबें भी दीं।


    बच्चों को शिक्षित करने का सफर कहां तक पहुंचा?

    आदित्य : लखनऊ से जब निकला तो सबसे पहले दिल्ली गया, फिर उत्तराखंड ,हिमाचल, चंडीगढ़, जम्मू और कश्मीर, पंजाब ,हरियाणा, राजस्थान, गुजरात तक होकर आया हूं। पूरा सफर साइकिल से ही करता हूं क्योंकि मेरे पास यही साधन है और पहचान भी। अब तक 35,000 क्लास चलाई हैं 27 साल की यात्रा में 1  लाख 17 हजार किलोमीटर की साइकिल यात्रा की है।

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  • राजेश कुमार, दिल्ली : पुल के नीचे लगाई पाठशाला, 300 बच्चों की जिंदगी में फैला रहे शिक्षा का उजाला

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    फ्लाईओवर स्कूल की शुरुआत कैसे हुई?

    राजेश- 2006 में दो बच्चों के साथ स्कूल की शुरुआत की थी। आज 13 साल हो चुके हैं। जो बच्चे यहां से पढ़कर गए थे वे आज कॉलेजों में पढ़ रहे हैं, कुछ आईटीआई भी कर रहे हैं। उनकी जिंदगी में बदलाव आया है। पहले बच्चों के घर में कोई भी पढ़ा लिखा नहीं होता था, अब वे खुद बच्चों को यहां पढ़ने भेजते हैं। न हम बच्चों से कोई फीस लेते हैं और न ही यहां पढ़ाने वाले टीचर को फीस दी जाती है। मेरा लोगों से कहना है कि यहां पर पैसा खर्च मत करो यहां सिर्फ अपना समय खर्च करो।


    कितना बदलाव आया है और लक्ष्य में कितनी सफलता मिली?

    राजेश: मैं अपने आपको सफल मानता हूं क्योंकि 2 बच्चों के साथ शुरुआत की थी, आज 300 बच्चों को पढ़ा रहा हूं। स्कूल दो शिफ्ट में चलता है , सुबह 9 बजे से लड़के आते हैं और 2 बजे से लड़कियां। लड़कियों की संख्या लड़कों से ज्यादा है। पहले माता-पिता बच्चों को स्कूल भेजने से डरते थे लेकिन आज स्कूल में 4 से 15 साल तक के लड़के-लड़कियां हैं। मेरा एक ही लक्ष्य है गरीब बच्चों को शिक्षित करना। यहां के बच्चे पढ़कर डॉक्टर, इंजीनियर, पुलिस में जाएं तो मुझे लगेगा सपना पूरा हो गया है। 


    अपनी पर्सनल लाइफ और कोचिंग को कैसे मेनेज करते हैं?

    राजेश: मैं एक दुकान चलाता हूं, जिससे मेरा और परिवार का खर्च निकल जाता है। मेरे इस स्कूल के निर्णय से परिवार संतुष्ट तो नहीं है लेकिन मेरे लिए यह एक अभियान है जिसे कभी रोक नहीं सकता। 


    क्या आर्थिक सहायता मिलती है? 

    राजेश: किसी भी तरह की आर्थिक मदद नहीं मिलती। मदद करने वालों से मैं पैसे नहीं बल्कि स्टूडेंट्स के लिए कॉपी, किताबें, पेन और पेपर देने की गुजारिश करता हूं। सरकार से कोई मदद नहीं मिलती है। हमने स्कूल को एनजीओ की तरह नहीं रखा है जैसे कि कोई भी हमें कुछ देगा तो हम उसका लेखा-जोखा रखेंगे। यह हमारी छोटी सी पहल है, इसे हम एनजीओ नहीं बनाना चाहते हैं।

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  • बाबर अली, पश्चिम बंगाल: 17 साल में 6 हजार बच्चों बच्चों को दी मुफ्त शिक्षा, तैयार किया विद्यालय

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    कैसे हुई थी शुरुआत?

    बाबर : बच्चों को पढ़ाने की शुरुआत 2002 में हुई तब मैं कक्षा 5 का छात्र था। स्कूल घर से 10 किलोमीटर दूर था। उस उम्र में मैं खेतों में काम कर रहे और मवेशी चरा रहे बच्चों को पढ़ाता था। मैंने ऐसे 8 बच्चों को इकट्ठा किया जिसमें मेरी बहन पहली स्टूडेंट थी। स्टूडेंट बढ़े तो लोगों की मदद से स्कूल की शुरुआत की। शिक्षा इसलिए भी जरूरी है क्योंकि सही मायने में यह इंसान का निर्माण करती है।


    अपने लक्ष्य में कितने सफल हुए हैं?

    बाबर : मेरा सपना था जो बच्चे स्कूल नहीं जा पाते हैं उन्हें अच्छी शिक्षा देना। पिछले 17 सालों में अब तक मेरे स्कूल से करीब 6,000 स्टूडेंट्स पढ़कर निकले हैं। मैं इसे एक उपलब्धि के तौर पर देखता हूं। इतने बच्चों की जिंदगी में उजाला आया, यह सफलता से कम नहीं। इसकी स्कूल से पढ़ने वाली 6 स्टूडेंट्स आज यहीं पढ़ा भी रही हैं। सभी लड़कियां हैं जिसमें मेरी बहन भी शामिल है। 


    किसी तरह आर्थिक सहायता मिलती है?

    बाबर : 2015 तक स्कूल बिना छत और दीवार के ही चलता था। लेकिन जब लोगों को स्कूल के बारे में जाना तो मदद के लिए आगे आए। स्कूल को बनवाने में आर्थिक सहायता की। कई संगठनों ने किताबें भी उपलब्ध करवाईं। लेकिन सरकार की ओर से कोई मदद नहीं मिली। 

      

    निजी जिंदगी और टीचिंग के बीच कैसे तालमेल बिठाते हैं?

    बाबर : मैंने बचपन से अपना रोल माॅडल स्वामी विवेकानंद को माना है और सीखा है कि सर्विस टू मैन एंड सर्विस टू गॉड। बस इसी बात को ध्यान में रखते हुए निजी जिंदगी से समय निकालकर बच्चों को पढ़ाता हूं। 

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