सफलता एक लंबी प्रक्रिया है जिससे हर किसी को गुजरना पड़ता है : रणवीर बरार

गुरुद्वारे में लंगर तैयार करने से कुकिंग में हुई रुचि, तो लखनऊ में सीखा कबाब बनाना, अब हैं मास्टर शेफ

First Person। मैं लखनऊ की गलियाें का खाना चखते और खाते बड़ा हुआ। मुझे आज तक याद है कि किस तरह बचपन में मेरे दादाजी मुझे साइकिल पर बिठाकर गुरुद्वारे ले जाते थे। वहां मैं भी सबके साथ मिलकर कोई न कोई सेवा करता था। एक बार जब मैं गुरुद्वारे में खाली समय में बैठा हुआ था, तो मैं किचन की ओर चला गया। उस दिन किचन में काम करने वाली महिला नहीं आई थी और मुझे उसकी जगह मीठे चावल तैयार करने का मौका मिला। वह पहला मौका था जब मुझे लंगर में मीठे चावल पकाने का अवसर मिला। उस समय मेरी उम्र मात्र 13-14 वर्ष रही होगी। हालांकि उस दौरान मुझे यह खुशी तो हो रही थी कि लोग वे चावल खा रहे थे जो मैंने पकाए थे, लेकिन तब तक मैंने दूर-दूर तक भी यह तय नहीं किया था कि मैं भविष्य में शेफ बनूंगा। ऐसे में टीवी होस्ट या ट्रैवल होस्ट बनने का विचार मुझे कभी आया ही नहीं था।

जिद के चलते छोड़ा घर, सीखने की ललक से पाया मुकाम
गुरुद्वारे की उस घटना के बाद से मेरा रुझान खाना पकाना सीखने की ओर हुआ जिसे ध्यान में रखते हुए मैं लखनऊ, अमीनाबाद जैसे शहरों की गलियों में बहुत ध्यान से खाने की चीजों को बनते हुए देखने लगा। इसके साथ ही मैं उन खास पकवानों के बारे में जानकारियां और उनसे संबंधित कहानियां भी जुटाने लगा। इस तरह धीरे-धीरे इस ओर मेरी रुचि बढ़ने लगी और मैंने खुद को एक शेफ के रूप में स्थापित करने के बारे में निश्चय किया। हालांकि मैंने जब इस बारे में अपने माता-पिता से बात की, तो उन्होंने मुझे परिवार की साख, जॉब सिक्योरिटी जैसी बातों का हवाला देते हुए स्पष्ट रूप से मना कर दिया, लेकिन उनके इनकार ने मेरी जिद को और मजबूत बना दिया। इस तरह जब मेरी उम्र 17 साल थी, तो अपनी जिद के चलते मैंने घर छोड़ दिया और लखनऊ जाकर मुनीर उस्ताद से कबाब बनाना सीखने लगा।  

बर्बाद होने के बाद फिर नए जोश के साथ किया काम
दरअसल जिद एक तरह से किसी जिम्मेदारी की तरह होती है जिसे निभाना पड़ता है और खास बात यह है कि मैंने वह जिम्मेदारी बहुत ही कम उम्र में ले ली। कई जगह काम करने और सीखने का फायदा यह रहा कि मैं 25 साल की उम्र में ही एक फाइव स्टार होटल का सबसे कम उम्र का एग्जीक्यूटिव शेफ बन गया था। उस समय लगा कि जैसे मैंने सबकुछ हासिल कर लिया हो। इस तरह मेरे मन में एक तरह का अहंकार पैदा हो गया जिसके चलते मैं अमेरिका चला गया और वहां जाकर मैंने एक रेस्टोरेंट खोला जो व्यवसाय की अधिक समझ न होने के कारण डेढ़ साल में ही बंद हो गया। बर्बादी के चलते मैं डिप्रेशन में आ गया। हालांकि उस दौरान मैंने जीवन का एक सबसे बड़ा सबक लिया कि जब आपके पास खोने को कुछ नहीं होता और आप खुद को एकदम नीचे देखते हैं, तो एक नई तरह की जिद और लड़ने का साहस आपके अंदर भर जाता है।

मेरी सफलता के पीछे मुश्किलें व अथक मेहनत
उस दौर में जबकि मैं सबकुछ खो चुका था, मेरे एक दोस्त ने मेरी मदद की और मुझे अपने रेस्टोरेंट में काम करने का मौका दिया। उस दौरान इस काम को मैंने नए जोश के साथ अपनाया, बल्कि ये कहना चाहिए कि उसी जिद के चलते लगातार पिछले लगभग 20 सालों से आज तक मैं हर रोज खाना बना रहा हूं। आज लोग मुझे अगर एक सफल व्यक्ति के रूप में देखते हैं, तो उसके पीछे मेरी सालों की मेहनत और एक लम्बी कहानी है। टेलीविजन पर किसी सफल व्यक्ति को देखते हुए अक्सर हम उनकी मुश्किलों, अथक मेहनत और मानसिक परेशानी के बारे में नहीं सोचते। ध्यान रखें, चाहे संजीव कपूर हों, विकास खन्ना हों, कुणाल कपूर हों या कोई और सेलेब्रिटी शेफ, सभी एक लंबी प्रक्रिया से गुजरकर ही वहां पहुंचे हैं जहां वे आज हैं।
 

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