MPPSC / आरक्षण के पेंच में उलझा प्रदेश के 2.5 लाख छात्रों का भविष्य

फिर 20 साल पहले जैसी स्थिति, 2019 की परीक्षा के लिए अब तक नोटिफिकेशन नहीं

एजुकेशन डेस्क। मप्र लोक सेवा आयोग (एमपीपीएससी) से होने वाली प्रशासनिक अधिकारियों समेत अन्य भर्तियां अटकी हुई हैं। एमपीपीएससी द्वारा जनवरी में जारी की जाने वाली अधिसूचना अब तक जारी नहीं हुई है। ऐसे में उम्मीदवार आशंकित है कि दोबारा 20 साल पहले जैसी स्थिति न बन जाए, क्योंकि प्रदेश में आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के उम्मीदवारों के लिए ओबीसी का आरक्षण 14% से बढ़ाकर 27% कर दिया गया है। इससे अब प्रदेश में आरक्षण 50% से अधिक यानी 73% हो गया है। इसके चलते सामान्य वर्ग के 4 उम्मीदवारों ने राज्य सरकार के इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दे दी है। हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को नोटिस जारी कर 3 सप्ताह में जवाब मांगा है।

एडवोकेट आदित्य संघी ने बताया कि प्रदेश सरकार ने पहले 8 मार्च को अध्यादेश जारी कर ओबीसी आरक्षण 14 से बढ़ाकर 27% कर दिया, फिर एक्ट पारित कर दिया गया। वहीं, 10% आरक्षण इकोनॉमिकली वीकर सेक्शन (ईडब्ल्यूएस) के लिए लागू किया गया। एससी को 16%, एसटी को 20% आरक्षण है। ऐसे में आरक्षण 73% हो गया है, जबकि इंदिरा शाहनी बनाम भारत सरकार के प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट ने करीब 26 साल पहले अपने जजमेंट में कहा था कि कुल आरक्षण की सीमा 50% से अधिक नहीं हो सकती। ऐसा होना संविधान के खिलाफ है। जबलपुर हाईकोर्ट ने सुनवाई के बाद सरकार को नोटिस जारी कर तीन सप्ताह में जवाब मांगा है। इस मामले की 9 सितंबर को फिर से सुनवाई होगी। याचिका भोपाल के प्रत्येश द्विवेदी, टीकमगढ़ के पारस जैन, मुरैना के नीतेश जैन और छिंदवाड़ा के रामसुंदर रघुवंशी की ओर से दाखिल की गई है। 

मप्र से ज्यादा आरक्षण तमिलनाडु में
याचिकर्ताओं के वकील आदित्य संघी ने बताया कि तमिलनाडु के बाद मप्र भारत में दूसरा राज्य है, जहां आरक्षण की सीमा 50% से अधिक होकर 73% हो गई है। महाराष्ट्र में भी 50% से अधिक आरक्षण है। महाराष्ट्र सरकार के फैसले को भी सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। 

9 सितंबर को सुनवाई... हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से तीन सप्ताह में मांगा जवाब

5 साल रुकी रही थी भर्ती प्रक्रिया
दिग्विजय शासनकाल में भी ओबीसी आरक्षण 27% किया गया था। इस निर्णय को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी। इस दौरान सरकार की और से हाईकोर्ट में सही ढंग से जवाब प्रस्तुत नहीं किया गया, इसके चलते 2001 से 2005 तक भर्ती प्रक्रिया रुकी रही थी। इसके बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर ने 2006 में वापस ओबीसी आरक्षण कम किया था। इसके बाद लगातार भर्तियां हो रही थीं, लेकिन अब एक बार फिर एमपीपीएससी का कैलेंडर गड़बड़ा गया है। इससे लाखों युवा परेशान हैं।

पुराने नियमों से की जाए भर्ती
पीएससी से होने वाली भर्ती प्रक्रिया में हर साल प्रदेशभर से ढाई लाख से अधिक उम्मीदवार शामिल होते हैं। अब उम्मीदवारों के सामने सबसे बड़ी चिंता रोजगार की है। बड़ी मुश्किल से परीक्षाएं शुरू हो पाई थीं, लेकिन आरक्षण की नई व्यवस्था ने विवाद खड़ा कर दिया है। उम्मीदवारों का कहना है कि पुराने नियमों से ही पीएससी का नोटिफिकेशन जारी किया जाना चाहिए। पीएससी से हर साल राज्य प्रशासनिक सेवा के करीब 500 पदों के लिए भर्तियां निकलती हैं।

फैसले पर पहले भी लग चुकी है रोक
मप्र हाईकोर्ट ओबीसी को 27% आरक्षण देने के कमलनाथ सरकार के फैसले पर पहले भी रोक लगा चुकी है। मार्च 2019 में जस्टिस आरएस झा व संजय द्विवेदी की खंडपीठ ने आदेश में कहा था कि 25 मार्च से एमबीबीएस में चयन के लिए प्रस्तावित काउंसिलिगं में ओबीसी को 14% आरक्षण दिया जाएगा। जबलपुर की असिता दुबे, भोपाल की ऋचा पांडे व सुमन सिंह ने याचिका में कहा था कि संविधान के अनुच्द 16 में प् छे रावधान है कि एससीएसटी-ओबीसी को मिलाकर आरक्षण 50% से अधिक नहीं होना चाहिए।

अब जिम्मेदार कह रहे...नई आरक्षण नीति लागू होनी है, इसलिए पीएससी के नोटिफिकेशन में हो रही देरी 
शासन से मांग-पत्र मिलते ही जारी करेंगे नोटिफिकेशन

शासन की ओर से मांग-पत्र नहीं मिला है। मांग-पत्र मिलने पर ही नोटिफिकेशन जारी किया जा सकेगा। नई आरक्षण नीति लागू होनी है, इसलिए इसमें देरी हो सकती है। आरक्षण को लेकर उम्मीदवार कोर्ट जाएंगे या नहीं, इस बारे कोई टिप्पणी नहीं करूंगी।
- रेणु पंत, सचिव, मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग

एक्सपर्ट व्यू...50% से अधिक नहीं हो आरक्षण
50% से अधिक आरक्षण नहीं दिया जाना चाहिए। सरकार को इस संबंध में जल्द ही निर्णय लेना चाहिए। सरकार यदि निर्णय नहीं लेगी तो युवाओं को बेरोजगारी की मार झेलनी पड़ेगी। प्रदेश में पहले भी ऐसी स्थिति बनी है, जब लंबे समय तक भर्तियों पर रोक लगी रही।
- अरुण गुर्टू, रिटायर्डडीजी व कुलपती
 

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