धैर्य के साथ मेहनत करते रहें, यही है सफलता का फॉर्मूला- पंकज त्रिपाठी

गांव में मजाक ही मजाक में निभाया फीमेल रोल आगे चलकर एक्टिंग की दुनिया में कॅरिअर की शुरुआत का कारण बना

First Person। मेरा जन्म बिहार के गोपालगंज डिस्ट्रिक्ट के एक किसान परिवार में हुआ। हम अपने छोटे से खेत में आलू, गन्ना, गेहूं आदि की खेती करते थे जो हमारे परिवार के लिए काफी होता था। मैं अपने चार भाई- बहनों में सबसे छोटा था और पढ़ाई के लिए गांव छोड़ने से पहले खेत पर अपने पिता की मदद करता था। फसल बोते-उगाते ही हम बड़े हुए। किसान का काम बहुत मुश्किल होता है क्योंकि यह पूरी तरह से प्रकृति पर निर्भर करता है। एक तूफान आपकी साल भर की मेहनत को खराब कर सकता है। किसानी जीवन को जीने के बहुत सबक देती है जिनका असर अब भी मैं अपनी सोच में महसूस करता हूं। 

ड्रामा में किया फीमेल लीड कैरेक्टर का रोल प्ले
- मैंने सिनेमा के बारे में कभी सोचा ही नहीं था, न ही दूर-दूर तक कोई संबंध था। टेलीविजन भी पहली बार तब देखा था जब 1988 में महाभारत का टेलीकास्ट हुआ था। मेरी एक्टिंग की शुरुआत एक घटना से हुई। दरअसल हमारे गांव के ड्रामा में जिस व्यक्ति को फीमेल लीड का रोल करना था, वह कहीं चला गया और समय पर मिल नहीं रहा था। गांव में जो लोग औरतों का किरदार करते थे, उनका बहुत मजाक बनाया जाता था और औरतें ड्रामा में भाग नहीं लेती थीं। मैं तब सोलह साल का था, मैंने तो मजाक में उस रोल के लिए हां कर दिया। उस ड्रामा को करके मुझेकाफी अच्छा लगा, लेकिन तब भी इस बात का कहीं ख्याल नहीं था कि जीवन में क्या करना है।

बहुत शक्तिशाली माध्यम है अभिनय
- पटना में पढ़ाई करते हुए मैं एक बात समझ गया था कि मुझे न तो किसान बनना था और न ही 9 से 5 का कोई जॉब करना था, लेकिन क्या करना था, तब इसके बारे में बहुत सोचा नहीं। मेडिकल की पढ़ाई की, लेकिन पास नहीं हुए, तो हिंदी साहित्य से बीए की पढ़ाई करना तय किया। उसी दौरान मैंने लक्ष्मीनारायण लाल का नाटक अंधा कुआं देखा और देखते हुए रोने लगा। तब मुझे अहसास हुआ कि एक्टिंग कितना पावरफुल माध्यम है। उसके बाद मैं पटना में कोई भी नाटक छोड़ता नहीं था, धीरे-धीरे एक्टर्स से मेरी जान-पहचान हुई और मैंने भी नाटकों में भाग लेना शुरू कर दिया। थोड़ी समझ बनी, तो एनएसडी के लिए एप्लाई किया और वहां सलेक्ट हो गया।

पसंद के काम में संघर्ष करना भी पड़े तो महसूस नहीं होता है
- एक्टिंग की इस यात्रा में अगर संघर्ष जैसा कुछ हुआ भी तो महसूस नहीं हुआ। यह मेरे पसंद का काम है और पसंद के काम में आपको इतना आनंद आता है कि बाकी कुछ ध्यान ही नहीं रहता। इसके अलावा किसान परिवार का होनेकी वजह से मुझमें धैर्य और मेहनत करने जज्बा भी बहुत है। किसान का काम भी बहुत धैर्यका काम होता है। फसल पकने के लिए इंतजार करना पड़ता है। फसल अगर किसी कारणवश खराब हो जाए, तो दोबारा से शुरुआत करनी पड़ती है और हर बार उतनी ही मेहनत करनी पड़ती है, तब जाकर कहीं फल मिलता है। देखा जाए, तो जीवन में सफलता का फॉर्मूला भी यही है कि धैर्यके साथ मेहनत करते रहें।
 

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