यह मेरा पैशन ही था जिसने मुझे वर्ल्डचैंपियन बनाया: मानसी जोशी

एक्सीडेंट में पैर खोया तो प्रोस्थेटिक लेग से फिर खड़ी हुई

First Person। मैं केवल छह साल की थी जब मैंने अपने पिता के साथ बैडमिंटन खेलना शुरू कर दिया था और इसे आगे भी जारी रखा। 15 साल की उम्र में मैंने स्टेट-लेवल टूर्नामेंट्स खेलने शुरू कर दिए और फिर प्रोफेशनल ट्रेनिंग की जरूरत महसूस हुई तो बैडमिंटन कोचिंग क्लासेज जॉइन कर लीं। इसके बाद वर्ष 2009 में मुझे नेशनल गेम्स में हिस्सा लेने का मौका भी मिला। इसी बीच मैंने इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में बीई भी कर लिया। लेकिन कम्प्यूटर साइंस में अपनी रुचि के चलते मैंने सॉफ्टवेयर डेवलप करना भी सीखा और फिर कॉर्पोरेट सेक्टर को एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर के तौर पर कॅरिअर शुरू किया। जॉब में रहते हुए मेरी लीडरशिप क्वालिटीज को बहुत सराहा जाता था जो मैंने अपने खेल से ही सीखी थीं। सबसे अच्छी बात तो यह रही कि जॉब के दौरान भी मैं ऑफिस के लिए खेलती रही।

एक्सीडेंट में पैर खोया तो प्रोस्थेटिक लेग से फिर खड़ी हुई
वर्ष 2011 में ऑफिस से घर लौटते समय मैं एक गंभीर एक्सिडेंट की शिकार हो गई और उस हादसे में मैंने अपना बायां पैर खो दिया। इस घटना के बाद मैं अगले दो साल तक घर पर ही रही और इस दौरान मैं आगे के लिए भी प्लान्स बनाती रही। इस बीच मैंने माइक्रोप्रोसेसर आधारित प्रोस्थेटिक्स के बारे में सुना, लेकिन भारत में उनकी कीमत अधिक होने के कारण मेरी फैमिली इस सुविधा को मुझे दिलवाने में असमर्थ थी। हालांकि बाद में मेरे पिता और मेरे ऑफिस की डिसेबल्ड हेल्प सेल की ओर मिले फंड्स से मैं प्रोस्थेटिक लेग लगवा सकी। 

दोस्त की सलाह पर बढ़ाए एशि यन गेम्स की ओर कदम
एक्सिडेंट से पहले वर्ष 2010 में मैंने इंटर कंपनी बैडमिंटन चैंपियनशिप में गोल्ड जीता था। एक्सिडेंट से उबरने के बाद वर्ष 2012 में तीन-चार महीने की वॉकिंग प्रैक्टिस करते हुए मैंने उसी चैंपियनशिप में भाग लिया और फिर से गोल्ड जीता। यह मेरे लिए टर्निंग पॉइंट था। मैं जानना चाहती थी कि मैं अब और कितना बेहतर खेल सकती हूं और इसके लिए मैं किसी सीमा में भी नहीं बंधना चाहती थी। इस ख्याल के बाद से ही मैंने खुद को नई चुनौतियां देना शुरू कर दिया। मैंने स्कूबा डाइविंग सीखी और बैडमिंटन खेलना जारी रखा। वर्ष 2014 में जब मैंने एक बार फिर गोल्ड जीता तो मेरे एक दोस्त ने मुझे पैरा एशियन गेम्स में भाग लेने की सलाह दी।

आपका माइंडसेटही तय करता है क्याहोगी जीवन की दिशा
इन गेम्स में शुरुआत में मैं मेडल नहीं जीत पाई, लेकिन इस दौरान मिली सराहना ने मेरे अंदर मोटिवेशन पैदा किया। जॉब के साथ ट्रेनिंग्स लेना भी मेरे लिए एक मुश्किल टास्क था, लेकिन मेरे पैशन ने मुझे हार नहीं मानने दी। इसी जज्बे के साथ आज मैं पैरा बैडमिंटन वर्ल्ड चैंपियनशिप में विमन्स सिंगल का गोल्ड मेडल जीतकर विश्व में अपनी पहचान बना सकी हूं। अब तक की अपनी यात्रा से मैंने सीखा है कि हमारा माइंडसेट ही यह तय करता है कि हम जीवन में क्या कर पाएंगे। हमारे पास किसी भी स्थिति का सामना करने की ताकत होती है और हमारे लिए क्या सही होगा, यह हम खुद ही तय कर सकते हैं।  

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