सुरक्षित रास्ते पर चलने के बजाय खुदको आजमाइए : शिखा शर्मा

एक्सिस बैंक की एमडी शिखा शर्मा ने आंत्रप्रेन्योर्स के लिए साझा की हैं कुछ सलाहें

सक्सेस मंत्रा। जब मैं पांचवीं क्लास में थी तो प्रतिस्पर्धा मेरे लिए महत्वपूर्ण थी, साथ ही चीजों को जानने की काफी सारी उत्सुकता मेरे भीतर थी। मैं क्लास में हमेशा फर्स्ट आना चाहती थी। मुझे याद है एग्जाम का रिजल्ट आने वाला था। मेरे पेपर्स अच्छे हुए थे। एक दिन हमारी क्लास टीचर रिपोर्ट कार्ड्स के साथ क्लास में आई। उन्होंने मार्कशीट्स को स्कोर के अनुसार लगाकर उन्हें एक सफेद कागज से ढककर उन पर एक रबरबैंड लगा दिया। मैं बहुत उत्सुक थी यह जानने के लिए कि सबसे ऊपर किसका रिपोर्ट कार्ड है। पूरी क्लास के दौरान मेरा ध्यान रिपोर्ट कार्ड्स के उस बंडल पर था। अचानक टीचर ने मुझे बुलाया और उस बंडल को स्टाफ रूम में रखकर आने को कहा और यह भी कहा कि मुझे उसे देखना नहीं है। इस बात ने मेरी उत्सुकता को और बढ़ा दिया। स्टाफ रूम तक जाते हुए मेरे दिमाग में एक ही बात थी कि किसका रिपोर्ट कार्ड सबसे ऊपर है। बस उस पेपर को हटाकर यह देखा जा सकता था। लेकिन मैंने धैर्य रखना चुना और मार्क्स नहीं देखे। असल में सही और गलत को चुनने से जुड़ी ऐसी ही छोटी-छोटी दुविधाएं हमारे चरित्र का निर्माण करती हैं। जब हम गलत चुनते हैं तो खुद को गलतियों को दोहराने की अनुमति देते हैं। लेकिन अगर आप शुरुआत मुश्किल, लेकिन सही चुनाव से करते हैं तो गलतियों की संभावना कम से कम होती है। बिजनेस के लिए तो यह एक अहम सबक है।

 

एक्सिस बैंक की एमडी शिखा शर्मा ने आंत्रप्रेन्योर्स के लिए साझा की हैं कुछ सलाहें

आसान रास्ता तो सभी चुनते हैं 
- जिंदगी बार-बार आपको ऐसे मोड़ पर लेकर आएगी जहां आप खुद से पूछेंगे कि क्या आप एक सुरक्षित रास्ते पर चलना चाहेंगे या फिर एक ऐसा रास्ता चुनेंगे, जो मुश्किल है? इस स्थिति में जिस भी रास्ते का चुनाव आप करते हैं वही तय करेगा कि अंत में आप क्या बनेंगे।मैंने अक्सर मुश्किल रास्ते चुने और वे मेरे लिए सही भी साबित हुए। हालांकि शुरुआत बेहद चुनौतीपूर्ण रही, लेकिन बाद में नतीजे अच्छे रहे। याद रखें अब वक्त तेजी से बदल रहा है और ऐसे में उतनी ही तेजी से नई चीजें सीखना भी जरूरी है तभी आप खुद को बरकरार रख पाएंगे।

 

कंफर्ट जोन से बाहर शुरू होता है तरक्की का सफर
- सीखने की प्रक्रिया में मैंने कई उतार-चढ़ाव देखे और पाया कि जितना मैंने खुद को नई स्थितियों में डाला उतना ही मेरे रेलेवेंट बने रहने की संभावनाएं बनी रहीं। असल मे हमारी ग्रोथ तभी होती है जब हम कंफर्ट जोन से बाहर निकलते हैं।
- हर बार जब भी चुनने के लिए मेरे सामने कई विकल्प होते तब मैंने उस रास्ते को चुना जिसमें मुझे लर्निंग की संभावनाएं दिखीं। 'मुझे नहीं आता' यह कहने में मुझे कभी शर्मिंदगी नहीं हुई।
- याद रखें जब हम यह झिझक छोड़ देते हैं तभी अपने सीखने के दायरे को बढ़ा पाते हैं। आप चाहें तो किसी से भी सीख सकते हैं, चाहे वह फिर सबसे जूनियर कर्मचारी हो या आपके प्रतिस्पर्धी।

 

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