ऑडियो कंटेंट की जरूरत से बना हबहॉपर : गौतम राज आनंद

शुरुआत के दो ही साल में फोर्ब्स की 30 अंडर 30 लिस्ट में जगह बनाने में कामयाब हुए गौतम

Success Story। एक लीडर अपने उत्साह, सामर्थ्य और निर्णय लेने की क्षमता के कारण महान होता है। हबहॉपर के सीईओ और फाउंडर गौतम राज आनंद के लिए भी यह कहा जा सकता है। अवाॅर्ड विनिंग टेक आंत्रप्रेन्योर गौतम ने अपनी पढ़ाई दिल्ली यूनिवर्सिटी से की है। उन्होंने 2016 में हबहॉपर नामक पॉडकास्ट्स, कंटेंट एग्रीगेशन और पब्लिशिंग आधारित इस एआई बेस्ड प्लेटफाॅर्म की स्थापना की। इस प्लेटफॉर्म को शुरू करने के दो साल के अंदर ही फाॅर्ब्स मैगजीन ने अंडर 30 सफल लोगों में गौतम को जगह दी। वे इस साल इस सूची में अंडर 40 के लिए नॉमिनेट हुए।

रुकावटों व समस्याओं को ध्यान में रखकर लाए यह प्लेटफॉर्म
- हबहॉपर शुरू करने से पहले गौतम लंदन में एचएसबीसी प्राइवेट बैंक में काम कर रहे थे। अपने हम उम्र लोगों की तरह वे भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर अच्छे कंटेंट की तलाश करते थे। उसी दौरान उन्होंने अच्छे ऑडियो कंटेंट की बहुत कमी महसूस की जिसे दूर करने के लिए उन्होंने हबहॉपर की शुरुआत की। ऑडियो कंटेंट में ऑडियंस को बहुत कम रुकावटों का सामना करना होता है, यही इस प्रोजेक्ट की शुरुआत की मूल वजह रही। वे कहते हैं कि ऑडियो कंटेंट और पॉडकास्टिंग आप काम करते हुए भी सुन सकते हैं।
- उदाहरण के तौर पर आप यात्रा करते हुए, खाना बनाते हुए, सफाई करते हुए भी बहुत ही आसानी से ऑडियो कंटेंट सुन सकते हैं। उन्हें लगा कि ऐसे बहुत-से लोग होंगे जिन्हें इसकी आवश्यकता होगी। इस तरह उनका यह विचार सफल रहा और एक ही साल में उनके सब्सक्राइबर्स की संख्या पांच लाख तक पहुंच गई।

यदि आप आंत्रप्रेन्योर हैं तो हमेशा सीखने पर करें फोकस
- बिजनेस एक्सपीरिएंस बताते हुए गौतम कहते हैं कि किसी भी आंत्रप्रेन्योर के लिए सबसे जरूरी है कि वह हमेशा सीखता रहे। वे कहते हैं कि बिजनेस करने और नई कंपनी की शुरुआत करने के बारे में तो बहुत लोग सोचते हैं, लेकिन कुछ करने का निर्णय कम लोग ही कर पाते हैं, क्योंकि वे ही होते हैं जो सीखी हुई बातों पर इम्प्लीमेंट करते हैं। अतः जरूरी है कि आप तय समय में निर्णय लेना सीखें। आनंद का मानना है कि सिवाय सलाह देने के आपके आसपास का कोई भी व्यक्ति यह नहीं बता सकता कि आप क्या कर सकते हैं और क्या नहीं।

बीमार मां की इच्छा- शक्ति सेमिली प्रेरणा
- अपनी मां का उदाहरण देते हुए गौतम कहते हैं कि एक बार जब उनकी मां को पता चला कि उनकी हड्डियां कमजोर हो गई हैं और उनके अंदर एक अस्सी साल के व्यक्ति के समान दम बाकी है, तो यह सब जानने के बावजूद भी उनकी मां ने हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने अपनी हालत सुधारने के लिए काम किया जो दवाइयों पर निर्भर न होकर इस यकीन के सहारे था कि वे ठीक हो सकती हैं। एक आंत्रप्रेन्योर के तौर पर गौतम इस घटना को अपने जीवन में एक सबक के रूप में लेते हैं और मानते हैं कि हमारा यकीन चीजों को बदल देता है।

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