कल्पेश याग्निक का कॉलम: परीक्षाओं में बच्चे नहीं, समूचा राष्ट्र विफल हो रहा है

असंभव के विरुद्ध: अनुशासन, अभ्यास, अनुभूति और अनुभव आधारित अलख।

यह विद्यार्थियों की प्रसन्नता का समय है। विस्मयजनक परीक्षा परिणामों से दमकते भोले-भाले बच्चों की तस्वीरें, प्रेरणा दे रही हैं। उनकी प्रसिद्धि, उनके परिश्रम से है। उनकी प्रतिभा उन्हें शीर्ष पर ले गई है।
समूचा राष्ट्र उन पर गर्व कर रहा है।
किन्तु सफलता से दूर, उतने ही भले, उतने ही सुन्दर - लाखों बच्चे हैं। ये विभिन्न परीक्षाओं में विफल हुए हैं। मुख्य रूप से 10वीं व 12वीं में।
किन्तु ध्यान से देखेंगे तो बच्चे विफल नहीं हुए हैं। उनके स्कूल विफल हुए हैं। उन्हें पढ़ाने वाले शिक्षकों की असफलता है यह। हम सभी, समूचा राष्ट्र विफल हुआ है।
क्योंकि, हमने उनके बचपन की धमाचौकड़ी को अंकों की बेड़ियों से जकड़ लिया है।
यहां यह कहने का कतई प्रयास नहीं है कि अंकों का मापदण्ड होना ही नहीं चाहिए। मनुष्य जीवन प्रत्येक पल किसी न किसी तरह जांचा-परखा जाता ही है। तो विद्यार्थी भी जांचे ही जाएंगे।
जैसे, जहां अंकों की बाध्यता नहीं भी है - 8वीं तक - नो-डिटेन्शन पाॅलिसी के अंतर्गत - वहां भी परखने का तरीका है। कन्टीन्यूअस कम्प्रेहेन्सिव इवेल्युएशन (सीसीई) यही है। या कि यही ‘था’ - क्योंकि अब विफल होने वाले बच्चों को रोका जाएगा - ऐसा कानून तैयार है।
इस संदर्भ में सर्वाधिक महत्वपूर्ण घटना यह है कि शिक्षा के अधिकार के अंतर्गत यह वर्ष एकदम अलग है। 2010 में आए उक्त कानून के 8 वर्ष पूरे हो गए। चूंकि 8वीं तक ही बच्चों को बिना रोके आगे की कक्षा में पहुंचाए जाने का प्रावधान है - इसलिए ये वर्ष वास्तव में एक पूरी उस पीढ़ी को नई व्यवस्था में ढालने जा रहा है - जो ‘विफलता’ के भय से मुक्त पूरी आठ कक्षाओं तक पढ़ चुके हैं।
और अब पास-फेल के संघर्ष में शामिल होने जा रहे हैं।
और चूंकि हम सभी उस प्रावधान को लेकर दो भागों में बंटे हुए हैं - इसलिए इसे जानना या समझना बहुत आवश्यक है कि ‘कोई फेल नहीं’ व्यवस्था कैसी रही?
केन्द्र सरकार और उसकी पार्टी की अधिकांश राज्य सरकारें इसे विफल मानते हुए ही इसे समाप्त करने का कानून लाई हैं। किन्तु कई शिक्षाविद् विरोध कर रहे हैं।
अंकों का जाल फैला हुआ है। बच्चे उसमें उलझे हुए हैं। और ढेर सारे बच्चे इस जाल को कुशलतापूर्वक काट कर, प्रसन्नतापूर्वक दौड़ भी रहे हैं।
अंक रहेंगे ही।
परीक्षाएं होंगी ही।
होड़ मची ही रहेगी।
नाम चाहे जो रख लें।
अभी सीबीएसई 10वीं का परिणाम आया। मीडिया में बड़े-बड़े शीर्षक बने कि 87% परिणाम रहा। 1 लाख 30 हजार बच्चे इतने आगे निकल गए कि 90% या अधिक अंक ले आए। 27 हजार बच्चे तो 95% या अधिक लाए।
ये महत्वपूर्ण है। और बच्चों को पूरा श्रेय है।
किन्तु राष्ट्र इस प्रश्न का उत्तर भी पाना चाहेगा कि जब इतनी पढ़ाई करवाई जा रही है स्कूलों में - तो जो रिजल्ट पिछले वर्ष 91% था, या कि उससे ठीक पहले 96% था - वो घटकर 87% क्यों रह गया? पौने दो लाख बच्चों को पूरक परीक्षा क्यों देनी पड़ रही है?
और जो 10वीं-12वीं दोनों में प्रश्नपत्र क्यों लीक हुए थे - वो प्रश्न तो अभी हल हुआ ही नहीं है।
तो सरकार क्या कर रही है? बोर्ड क्या कर रहा है? स्कूल क्या कर रहे हैं?
और बच्चों की पढ़ाई, परिश्रम, प्रतिभा का भी यदि ध्यानपूर्वक सदुपयोग न हो - तो कितनी गंभीर स्थिति, कितनी भिन्नता, कितना पक्षपात होता है, इसका भी उदाहरण इसी रिजल्ट में दिखेगा।
सरकार का पूरा ध्यान नवोदय विद्यालयों पर है। बहुत ही अच्छी बात है। पिछड़े, कमजोर इलाकों से निखरती बाल प्रतिभाएं, अभावों से जूझते हुए 97% उत्तीर्ण हुए हैं। केन्द्रीय विद्यालयों की स्थापित, प्रतिष्ठित परम्परा है - वहां केन्द्र सरकार के अफ़सरों-कर्मचारियों के बच्चे पढ़ते हैं। बहुत ध्यान दिया जाता है। परिणाम 96% है।
इससे ठीक उल्टे, ढहते-चरमराते भवनों में लग रहे सरकारी स्कूलों का परिणाम है - 64%। यानी कोई देखने वाला नहीं। पढ़ाने गए या नहीं। पढ़ने आए बच्चों की अपेक्षा, उत्साह, अाकांक्षा - किसी को रुचि नहीं।
एक ही व्यवस्था, यानी सरकार इन सब को संचालित करती है। किन्तु कितना अंतर?
क्योंकि, जो बच्चे विफल हुए हैं - वे सामान्य सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं। तो विफल तो वे स्कूल ही हुए। किन्तु ये स्कूल बने रहेंगे। सफलतापूर्वक।
एक जगह पढ़ा कि हिमाचल में 55 सरकारी स्कूलों में 10वीं व 12वीं दोनों की राज्य बोर्ड परीक्षाओं में एक भी बच्चा पास नहीं हुआ! शीर्षक ऐसा क्यों नहीं हुआ कि 55 स्कूलों में हिमाचल प्रदेश फेल?
देश में दो सबसे बड़े सर्वेक्षण होते हैं शिक्षा के स्तर को जांचने के।
पहला है एनुअल सर्वे ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट। यह घर-घर जाकर होता है। दूसरा है नेशनल अचीवमेंट सर्वे। इसमें 700 जिलों के सरकारी स्कूलों की रिपोर्ट है। ये इसी माह प्रकाशित होने से चर्चा में आया।
दोनों भयावह स्थिति दिखाते हैं।
कि गणित को लेकर बच्चों में किस स्तर का भय है।
तीसरी कक्षा के बच्चे 64% गणित के प्रश्न हल कर पाए। घटकर 54 रह गया जब पांचवीं वाले बच्चों से पूछे। और घटकर 42% बचे, जब आठवीं के बच्चों से पूछे। 
ये बच्चों की अज्ञानता नहीं है।
उनके शिक्षकों की है।
इन स्कूलों की है।
न शिक्षक हैं। न भर्ती किए जा रहे हैं। न ट्रेनिंग दी जा रही है। न पैसे खर्च किए जा रहे हैं। 
हां, भव्य निजी स्कूलों ने भी इतनी होड़ के बावजूद कोई नवोदय या केन्द्रीय विद्यालय जैसे परिणाम नहीं दिए हैं। वे भी 89% पर अटके हैं 10-12वीं में।
कई प्रश्न हैं।
तिरुवनंतपुरम् रीजन ही 99.6% परिणाम क्यों देता है?
दक्षिण में पढ़ाई का स्तर ऊंचा क्यों है?
उत्तर में इतना खराब क्यों?
और जो ‘सभी पास’ व्यवस्था थी, उसमें सीसीई के माध्यम से जो बच्चों को निरंतर परखना था - वो फेल हुआ। स्कूल लागू नहीं कर पाए।
तो मानव प्रवृत्ति है कि यदि कोई टोकने वाला, याद दिलाने वाला, नियम बताने वाला, जगाने वाला नहीं होगा - तो हम क्यों कुछ करेंगे? सोते ही रहेंगे।
इसलिए बच्चों ने पढ़ना छोड़ा, क्योंकि शिक्षकों ने, स्कूलों ने पढ़ाना-परखना छोड़ दिया।
तो बहुत अच्छा होगा कि स्कूलों की ऐसी परीक्षा पुन: आरम्भ हो।
ऐसा नहीं है कि शिक्षक पीछे रहे हैं। बचपन बचाने के लिए कई शिक्षकों ने अनूठे प्रयोग भी किए हैं। स्कूल की पढ़ाई इतनी मनोरंजक बना डाली है कि बच्चे स्वयं पढ़ना चाहते हैं। खुले में पढ़ाना। 
पहले भी शिक्षक बच्चों को थाने और दृष्टिहीन सहायता विद्यालयों में ले जाते थे। ताकि बच्चे स्वयं देख सकें कि दुनिया कैसी है। अब परम्परा से आगे बढ़कर समूचे शहर में ले जाया जा रहा है। कोना-कोना दिखाया जा रहा है। गांवों में ले जाया जा रहा है। पुलों, नदियों, बांधों, खदानों, दफ़्तरों, कारखानों में भी ले जाया जा रहा है।
किन्तु इन प्रयोगों की सीमा है। पहला, तो बच्चों को सकारात्मक ऊर्जा देने वाली जगहों पर ही ले जाना उचित है। वे प्रसन्न रहें, ऐसे स्थलों पर।
खेलने-कूदने-खाने के दिन हैं उनके।
यही तो बचपन है।
मैदान। वर्षा। फूूल-पौधे। संगीत।
इसे बचाना है।
बच्चों को व्यर्थ विद्वान नहीं बनाना।
भविष्य में वे सबकुछ सीख जाएंगे। अपने आप।
अभी एक-दो दिन पहले ही मद्रास हाई कोर्ट ने केन्द्र व राज्य सरकारों को कड़ी फटकार लगाई है।
जस्टिस किरुवाकरण ने केन्द्र-राज्य सभी शिक्षा बोर्डों से स्पष्ट कहा है कि किसी भी हालत में किंडरगार्टन, पहली व दूसरी कक्षा के बच्चों को कोई, किसी भी तरह का ‘होमवर्क’ न दें।
उन्होंने कहा है - इतने छोटे बच्चों को निरर्थक ग्रामर और कम्प्यूटर साइंस क्यों पढ़ाया जा रहा है? ये उनके बचपन को लूटने जैसा है। और कहा कि ये बच्चे हैं, वेटलिफ्टर नहीं।
सच है।
सीबीएसई ने बताया कि वे पहले ही सख़्त नियम बना चुके हैं। पहली-दूसरी में केवल भाषा और गणित पढ़ाना है। फिर इन्वॉयरनमेंटल साइंस 5वीं तक।
भयंकर भीड़ भरे, भगदड़ के वातावरण में अंकों की तड़प भरी होड़ में घुटता बचपन हम बचा सकें - असंभव है। किन्तु बचाना ही होगा।
अन्यथा, वही होगा - जो करोड़ों के साथ हुआ है। कड़वी यादें जीवन भर पीछा करेंगी। विलियम वर्ड‌्सवर्थ की ‘चाइल्ड इज द फादर ऑफ मैन’ की तरह। कि जो बच्चे ने बचपन में अनुभव कर लिया, वही जीवन भर साथ चलेगा।

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