आजादी से पहले 18 साल तक देश में 26 जनवरी को मनाया गया स्वतंत्रता दिवस

हम 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस के रूप में जानते हैं, क्योंकि इसी दिन 1950 को हमारा संविधान लागू हुआ था

1920 आते-आते भारतीय नेताओं को लगने लगा था कि अंग्रेज सरकार प्रथम विश्व युद्ध के दौरान किए गए अपने वादों से पीछे हट रही है। जलियांवाला बाग हत्याकांड और रॉलेट एक्ट लागू करने से लोगों में डर और निराशा छाने लगी थी। रॉलेट एक्ट के जरिए ब्रिटिश सरकार ने युद्ध के दौरान लगाए गए आपातकालीन उपायों को अनिश्चितकाल के लिए बढ़ा दिया था। इससे टुकड़ों में ही सही पर देश ब्रिटिश हुकूमत के पंजे से अलग होने लगा। जब खिलाफत आंदोलन के नेताओं की बातों को अनसुना कर दिया गया तो भारतीय मुसलमानों ने खुद को हुकूमत से अलग कर लिया। इस सबका परिणाम 1 अगस्त 1920 को महात्मा गांधी द्वारा असहयोग आंदोलन के रूप में सामने आया और उनकी ही सहमति से खिलाफत आंदोलन समानान्तर रूप से चलने लगा।

बायकॉट करने की अपील की गई। लोगों से अंग्रेजों के समारोहों में न जाने, उनके द्वारा प्रदान की गई पदवियाें और पदों को छोड़ने के साथ ही विदेशी वस्तुओं का इस्तेमाल न करने व स्वदेशी को बढ़ावा देने का आह्वान किया गया। इतिहासकार विपिन चंद्रा के मुताबिक इस आंदोलन का असर यह हुआ कि कभी कांग्रेस को मुट्ठी भर लाेगों का संगठन कहने वाले अंग्रेज दोबारा ऐसा कहने का साहस नहीं कर सके। इस आंदोलन ने कर्मचारियोें, व्यापारियों, दुकानदारों के साथ ही बड़े अभिजात्य वर्गको कांग्रेस से जोड़ दिया। हालांकि चौरी-चौरा में भीड़ द्वारा एक पुलिस स्टेशन को जलाने के बाद हुई हिंसा में 22 लोगों की मौत के बाद गांधीजी ने आंदोलन को स्थगित कर दिया। मार्च 1922 में गांधीजी को गिरफ्तार कर लिया गया। फरवरी 1924 में स्वास्थ्य बिगड़ने पर उन्हें रिहा किया गया। इस अवधि में कांग्रेस में कुछ मतभेद उत्पन्न हो गए। अंग्रेज इसे पूरे देश में हवा देने लगे। इस बीच सुधारों को आगे बढ़ाने के लिए साइमन कमीशन का गठन किया गया, लेकिन इसमें एक भी भारतीय नहीं था। गांधी जी ने इसके विरोध में अपने अखबार यंग इंडिया में लिखा भी। 3 फरवरी 1928 को जब कमीशन भारत पहुंचा तो उसको कांग्रेस की अगुआई में काले झंडों के साथ सभी प्रमुख शहरों में विरोध का सामना करना पड़ा। लाहौर में विरोध के दौरान हुए लाठीचार्ज में लाला लाजपत राय बुरी तरह घायल हो गए और उनकी मौत हो गई। 

इसके बाद कांग्रेस ने देश में संवैधानिक सुधारों के प्रस्ताव के लिए मोतीलाल नेहरू के नेतृत्व में अपना आयोग बनाया। नेहरू आयोग की रिपोर्ट में भारत के लिए ब्रिटिश हुकूमत के अधीन (डोमिनियन स्टेटस) स्वराज देने की बात कही गई। हालांकि जवाहर लाल नेहरू और सुभाष चंद्र बोस सरीखे नेता इसे बहुत कम मानते थे। दिसंबर 1928 में कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में भारत को एक साल के भीतर ग्रेट डोमिनियन स्टेटस देने का प्रस्ताव पारित किया गया। ऐसा न करने कांग्रेस ने पूर्ण स्वराज की घोषणा की बात कही।

सरकार से कोई सहमति न मिलने पर कांग्रेस ने दिसंबर 1929 में लाहौर अधिवेशन में ऐतिहासिक प्रस्ताव पास करने की तैयारी कर ली। 26 दिसंबर 1929 को पूर्ण स्वराज का प्रस्ताव पारित हुआ। कांग्रेस ने 26 जनवरी 1930 को पूर्ण स्वराज दिवस (इंडिपेंडेंस डे) घोषित किया, क्योंकि इसी दिन से यह प्रस्ताव लागू हुआ था। हालांकि 15 अगस्त 1947 बाद में आधिकारिक स्वतंत्रता दिवस बना। 26 जनवरी 1930 को पूर्ण स्वराज के प्रस्ताव लागू होने की तिथि को महत्व देने के लिए ही 26 जनवरी 1950 को संिवधान को लागू किया गया।

लाहौर अधिवेशन का घोषणा-पत्र
‘हमारा मानना है कि बाकी लोगांे की तरह स्वतंत्रता भारतीयों का अधिकार है और वे अपने कठिन परिश्रम से मिले फल से अपनी जरूरतें पूरी कर सकें, ताकि उनके पास भी आगे बढ़ने के पूरे अवसर हों। भारत की ब्रिटिश सरकार ने भारतीयों को न केवल उनकी स्वतंत्रता से वंचित रखा बल्कि लोगों का बड़े पैमाने पर शोषण करके भारत को आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक तौर पर बरबाद किया है। इसीलिए भारत को ब्रिटिश सरकार से अलग होकर पूर्ण स्वराज या पूर्ण स्वतंत्रता चाहिए।’

Next News

इतिहास में आज (24/01/2018) / 69 साल पहले संविधान सभा ने जन गण मन को भारत के राष्ट्रगान के तौर पर स्वीकारा था

इसके पहले इसे 27 दिसंबर 1911 को कांग्रेस के कोलकाता अधिवेशन में गाया गया था

Array ( )