1971 का युद्धः एक हफ्ते में ही पाक नौसेना ध्वस्त की, 13 दिन में बन गया बांग्लादेश

लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा के सामने ढाका में आत्मसमर्पण के पत्र पर हस्ताक्षर करते पाक सेना का नेतृत्व करने वाले जनरल नियाज

एजुकेशन डेस्क। 16 दिसंबर 1971 का दिन। पाकिस्तान के जनरल नियाजी भारत के ले. जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा के साथ एक टेबल पर बैठे थे। भारत से लड़ाई हारने के बाद नियाजी 91 हजार सैनिकों के साथ सरेंडर कर रहे थे। यही वह दिन था जिस दिन बांग्लादेश का जन्म हुआ। जानिए पूरी कहानी...

बांग्लादेश के निर्माण की नींव 1970 के दौरान पाकिस्तान में हुए चुनाव से पड़ना शुरू हो गई थी। मुजीब-उर-रहमान के नेतृत्व वाली अवामी लीग ने बड़ी संख्या में सीटें जीतीं। पार्टी को 162 में से 160 सीटेंमिलीं। पूर्वी-पश्चिमी हिस्से को मिलाकर पाकिस्तान नेशनल असेम्बली में कुल 300 सीटें थी। नियमानुसार मुजीब-उर-रहमान को सरकार बनाने के लिए बुलाया जाना था, मगर ऐसा नहीं हुआ। पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के जुल्फिकार अली भुट्टो और सेना प्रमुख याह्या खान को यह जीत स्वीकार नहीं थी। क्योंकि पश्चिमी हिस्से में ज्यादा सीटें उनकी पार्टी के पास थी। वे चाहते थे कि मिली- जुली सरकार बन जाए। भुट्टो ढाका में मुजीब से मिले लेकिन बात नहीं बनी। इसके बाद 16 से 24 मार्च तक याह्या खान ने चालाकी से मुजीब को बातचीत के बहाने उलझाए रखा ताकि सेना और हथियार पूर्वी पाकिस्तान पहुंच जाए। इस बीच पाक सेना ने पूर्वी पाकिस्तान में अत्याचार शुरू कर दिए। 25 मार्च को याह्या खान ने मुजीब से बातचीत नाकाम होने की घोषणा कर दी और रात 9 बजे से सेना ने ढाका और अन्य जगहों पर मारकाट मचा दी। रात डेढ़ बजे मुजीब-उर-रहमान को गिरफ्तार कर लिया गया।

उन्होंने जनता को संबोधित करते हुए कहा- ‘यह मेरा आखिरी संदेश हो सकता है। लेकिन आज से बांग्लादेश आज़ाद है। मैं आपसे अपील करता हूं कि आप जहां भी है, आपके पास जो भी है उसी के दम पर पाकिस्तानी सेना से लड़ें। आपकी लड़ाई उस वक्त तक जारी रहनी चाहिए जब तक कि आप हमारी जमीन से पाकिस्तानी सेना को उखाड़ नहीं फेंक देते और अपना बांग्लादेश हासिल नहीं कर लेते।’ यह संदेश वायरलेस, फोन और टेलीग्राम के जरिए पूरे पूर्वी पाकिस्तान में फैल गया। लोग पाक सेना के अत्याचार से पीड़ित होकर पलायन करने लगे। वे भारत के पश्चिम बंगाल, असम,मेघालय व त्रिपुरा में शरण लेने लगे। करीब एक करोड़ शरणार्थी भारत में आ गए। 30 लाख तो अकेले त्रिपुरा में थे। मेघालय और त्रिपुरा तो खतरे में आ गए थे। पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी अपनी किताब द ड्रामेटिक डिकेड में लिखते हैं, ‘प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने सीमाएं खोल देने और वहां के लोगों की मदद का फैसला लिया।

उन्होंने अपने पिता नेहरूजी की बात को कायम रखा कि- जहां स्वतंत्रता खतरे में हो, न्याय पर संकट हो; हम (भारत) तटस्थ नहीं रह सकते। इंदिरा ने पूर्वी पाकिस्तान के नेताओं को सुरक्षा देने की घोषणा कर दी। पाकिस्तान को यह नागवार गुजरा और  उसने  धमकियां देनी शुरू कर दी। शरणार्थियों का  दबाव बढ़ने लगा तो इंदिरा ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से मदद मांगी। विदेश मंत्री स्वर्ण सिंह, मंत्रियों और प्रभावी नेता जयप्रकाश नारायण को एशिया, यूरोपीय देश और उत्तरी अमेरिका भेजा। मगर हल नहीं निकला।’ अमेरिका और चीन ने तो साफ इनकार कर दिया। उधर, बौखलाए पाकिस्तान ने 3 दिसंबर 1971 को अमृतसर, पठानकोट, अवंतिपुर और श्रीनगर हवाई अड्डे उड़ा दिए। इसके बाद भारत ने आपातकाल की घोषणा की और 13 दिन के युद्ध की शुरुआत हो गई। भारतीय सेना ने युद्ध को निर्णायक मोड़ पर पहुंचाते हुए पाकिस्तान की पनडुब्बी ‘गाजी’ को विशाखापट्टनम के पास डुबा दिया। इतिहास में पहली बार किसी नौसेना ने दुश्मन की नौसेना को एक हफ्ते के अंदर पूरी तरह नेस्तनाबूद कर दिया था। पाकिस्तान को भारी नुकसान पहुंचने लगा। यह देखकर पाक सेना का नेतृत्व कर रहे ले. जनरल एके नियाजी ने हार स्वीकार करते हुए 91 हजार सैनिकों के साथ आत्मसमर्पण कर दिया। पूर्वी पाकिस्तान को आजादी मिली और इसने बांग्लादेश का रूप लिया। तब जनरल सैम मानेकशॉ भारतीय सेना प्रमुख थे।

इंदिरा ने संसद में की घोषणाः इंदिरा गांधी ने 16 दिसंबर 1971 को संसद में कहा, ‘स्पीकर सर, मैं उस घोषणा को करने जा रही हूं, जिसका सदन को लंबे समय से इंतज़ार है। पश्चिमी पाकिस्तान की सेना ने बिना शर्त 4 बजकर 31 मिनट पर सरेंडर कर दिया है। इस पत्र पर पाकिस्तानी ईस्टर्न कमांड के जनरल एएए नियाजी और भारतीय-बांग्लादेशी सेना के कमांडर इन चीफ लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोरा ने दस्तखत किए हैं। ढाका अब पूरी तरह स्वतंत्र बांग्लादेश की राजधानी है।’

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